स्वार्थमें पागल जीव जबतक विवेक-दृष्टिका आश्रय लेकर इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको मिथ्या नहीं देखता, तबतक आत्मस्वरूपकी स्मृति खो बैठनेके कारण वह अज्ञानवश विषयप्रधान गृह आदिमें आसक्त रहता है और तरह-तरहके क्लेश उठाता रहता है॥ ७॥
यदा न पश्यत्ययथा गुणेहां
स्वार्थे प्रमत्तः सहसा विपश्चित्।
गतस्मृतिर्विन्दति तत्र तापा-
नासाद्य मैथुन्यमगारमज्ञः॥ ७
स्वार्थमें पागल जीव जबतक विवेक-दृष्टिका आश्रय लेकर इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको मिथ्या नहीं देखता, तबतक आत्मस्वरूपकी स्मृति खो बैठनेके कारण वह अज्ञानवश विषयप्रधान गृह आदिमें आसक्त रहता है और तरह-तरहके क्लेश उठाता रहता है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.5.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 594) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/5/7/