श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.5.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यदा न पश्यत्ययथा गुणेहां

स्वार्थे प्रमत्तः सहसा विपश्चित्।

गतस्मृतिर्विन्दति तत्र तापा-

नासाद्य मैथुन्यमगारमज्ञः॥ ७

yadā na paśyatyayathā guṇehāṃ

svārthe pramattaḥ sahasā vipaścit|

gatasmṛtirvindati tatra tāpā-

nāsādya maithunyamagāramajñaḥ|| 7

अर्थ

स्वार्थमें पागल जीव जबतक विवेक-दृष्टिका आश्रय लेकर इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको मिथ्या नहीं देखता, तबतक आत्मस्वरूपकी स्मृति खो बैठनेके कारण वह अज्ञानवश विषयप्रधान गृह आदिमें आसक्त रहता है और तरह-तरहके क्लेश उठाता रहता है॥ ७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें