श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

को न्वस्य१ काष्ठामपरोऽनुगच्छे-

न्मनोरथेनाप्यभवस्य योगी।

यो योगमायाः स्पृहयत्युदस्ता

ह्यसत्तया येन कृतप्रयत्नाः॥ १५

ko nvasya kāṣṭhāmaparo'nugacche-

nmanorathenāpyabhavasya yogī|

yo yogamāyāḥ spṛhayatyudastā

hyasattayā yena kṛtaprayatnāḥ|| 15

अर्थ

अहो! इन जन्मरहित भगवान् ऋषभदेवके मार्गपर कोई दूसरा योगी मनसे भी कैसे चल सकता है। क्योंकि योगीलोग जिन योगसिद्धियोंके लिये लालायित होकर निरन्तर प्रयत्न करते रहते हैं, उन्हें इन्होंने अपने-आप प्राप्त होनेपर भी असत् समझकर त्याग दिया था॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—को ह्यस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 602)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें