श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

इति ह स्म सकलवेदलोकदेवब्राह्मणगवां परमगुरोर्भगवत ऋषभाख्यस्य विशुद्धाचरितमीरितं२ पुंसां समस्तदुश्‍चरिताभिहरणं परममहामङ्गलायनमिदमनुश्रद्धयोपचितयानुशृणोत्याश्रावयति वावहितो३ भगवति तस्मिन् वासुदेव एकान्ततो भक्तिरनयोरपि समनुवर्तते॥ १६॥ यस्यामेव कवय आत्मानमविरतं विविधवृजिनसंसारपरितापोपतप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्त्या ह्यपवर्गमात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नो एवाद्रियन्ते४ भगवदीयत्वेनैव५ परिसमाप्तसर्वार्थाः॥ १७॥

yasyāmeva kavaya ātmānamavirataṃ vividhavṛjinasaṃsāraparitāpopatapyamānamanusavanaṃ snāpayantastayaiva parayā nirvṛttyā hyapavargamātyantikaṃ paramapuruṣārthamapi svayamāsāditaṃ no evādriyante bhagavadīyatvenaiva parisamāptasarvārthāḥ|| 17||

अर्थ

तरह-तरहके पापोंसे पूर्ण, सांसारिक तापोंसे अत्यन्त तपे हुए अपने अन्तःकरणको पण्डितजन इस भक्ति-सरितामें ही नित्य-निरन्तर नहलाते रहते हैं। इससे उन्हें जो परम शान्ति मिलती है, वह इतनी आनन्दमयी होती है कि फिर वे लोग उसके सामने, अपने-ही-आप प्राप्त हुए मोक्षरूप परम पुरुषार्थका भी आदर नहीं करते। भगवान्‌के निजजन हो जानेसे ही उनके समस्त पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते हैं॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—विशुद्धाचरितं पुंसां०।

    (मुद्रित पृष्ठ 602)
  2. ३

    प्रा० पा०—वावहितस्तस्मिन् वासुदेव।

    (मुद्रित पृष्ठ 602)
  3. ४

    प्रा० पा०—नैवाद्रियन्ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 602)
  4. ५

    प्रा० पा०—भगवत्तत्त्वेनैव।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 602)

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