sa bahuvinmahīpatiḥ pitṛpitāmahavad uruvatsalatayā sve sve karmaṇi vartamānāḥ prajāḥ svadharmamanuvartamānaḥ paryapālayat|| 4||
अर्थ
महाराज भरत बहुज्ञ थे। वे अपने-अपने कर्मोंमें लगी हुई प्रजाका अपने बाप-दादोंके समान स्वधर्ममें स्थित रहते हुए अत्यन्त वात्सल्यभावसे पालन करने लगे॥ ४॥
स बहुविन्महीपतिः पितृपितामहवद् उरुवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमानाः प्रजाः स्वधर्ममनुवर्तमानः पर्यपालयत्॥ ४॥
महाराज भरत बहुज्ञ थे। वे अपने-अपने कर्मोंमें लगी हुई प्रजाका अपने बाप-दादोंके समान स्वधर्ममें स्थित रहते हुए अत्यन्त वात्सल्यभावसे पालन करने लगे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.7.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 603) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/7/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1051 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकृति-विकृतिभिरनुसवनं → प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं