श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.7.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एवं वर्षायुतसहस्रपर्यन्तावसितकर्मनिर्वाणावसरोऽधिभुज्यमानं४ स्वतनयेभ्यो रिक्थं पितृपैतामहं यथादायं विभज्य स्वयं सकलसम्पन्‍निकेतात्स्वनिकेतात् पुलहाश्रमं५ प्रवव्राज॥ ८॥ यत्र ह वाव भगवान् हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन संनिधाप्यत इच्छारूपेण॥ ९॥ यत्राश्रमपदान्युभयतोनाभिभिर्दृषच्चक्रैश्‍चक्रनदी नाम सरित्प्रवरा सर्वतः पवित्रीकरोति॥ १०॥✎ 934

evaṃ varṣāyutasahasraparyantāvasitakarmanirvāṇāvasaro'dhibhujyamānaṃ svatanayebhyo rikthaṃ pitṛpaitāmahaṃ yathādāyaṃ vibhajya svayaṃ sakalasampanniketātsvaniketāt pulahāśramaṃ pravavrāja|| 8||

अर्थ

इस प्रकार एक करोड़ वर्ष निकल जानेपर उन्होंने राज्यभोगका प्रारब्ध क्षीण हुआ जानकर अपनी भोगी हुई वंशपरम्परागत सम्पत्तिको यथायोग्य पुत्रोंमें बाँट दिया। फिर अपने सर्वसम्पत्तिसम्पन्‍न राजमहलसे निकलकर वे पुलहाश्रम (हरिहरक्षेत्र)-में चले आये॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—वसरो विभुज्यमानं तनयेभ्यः पितृ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 604)
  2. ५

    प्रा० पा०—पुलहश्रममेष प्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 604)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #934 शब्दोंके बीचका स्थान: इच्छारूपेण॥९॥ → इच्छारूपेण॥ ९॥

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