ekadā tu mahānadyāṃ kṛtābhiṣekanaiyamikāvaśyako brahmākṣaramabhigṛṇāno muhūrtatrayamudakānta upaviveśa|| 1||
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—एक बार भरतजी गण्डकीमें स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो प्रणवका जप करते हुए तीन मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे॥ १॥
एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश॥ १॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—एक बार भरतजी गण्डकीमें स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो प्रणवका जप करते हुए तीन मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 606) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/8/1/