श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११॥ कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति॥ १२॥ पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप॥ १३॥ क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति॥ १४॥✎ 937 1053

pathiṣu ca mugdhabhāvena tatra tatra viṣaktamatipraṇayabharahṛdayaḥ kārpaṇyātskandhenodvahati evamutsaṅga urasi cādhāyopalālayanmudaṃ paramāmavāpa|| 13||

अर्थ

मार्गमें जहाँ-तहाँ कोमल घास आदिको देखकर मुग्धभावसे वह हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे दयावश उसे अपने कंधेपर चढ़ा लेते। इसी प्रकार कभी गोदमें लेकर और कभी छातीसे लगाकर उसका दुलार करनेमें भी उन्हें बड़ा सुख मिलता॥ १३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #937 शब्दोंके बीचका स्थान: ॥११॥ → ॥ ११॥
  • #1053 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): आसीत → आसीत्

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