श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश॥ १॥ तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २॥ तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्‍नादो लोकभयङ्कर उदपतत्॥ ३॥ तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम॥ ४॥

tayā pepīyamāna udake tāvadevāvidūreṇa nadato mṛgapaterunnādo lokabhayaṅkara udapatat|| 3||

अर्थ

अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी॥ ३॥

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