॥ श्रीहरिः ॥
अथ कदाचित्कश्चिद् वृषलपतिर्भद्रकाल्यै४ पुरुषपशुमालभतापत्यकामः॥ १२॥ तस्य ह दैवमुक्तस्य पशोः पदवीं तदनुचराः परिधावन्तो निशि निशीथसमये तमसाऽऽवृतायामनधिगतपशव आकस्मिकेन विधिना केदारान् वीरासनेन मृगवराहादिभ्यः संरक्षमाणमङ्गिरःप्रवरसुतमपश्यन्॥ १३॥
atha kadācitkaścid vṛṣalapatirbhadrakālyai puruṣapaśumālabhatāpatyakāmaḥ|| 12||
अर्थ
किसी समय डाकुओंके सरदारने, जिसके सामन्त शूद्र जातिके थे, पुत्रकी कामनासे भद्रकालीको मनुष्यकी बलि देनेका संकल्प किया॥ १२॥
अथ कदाचित्कश्चिद् वृषलपतिर्भद्रकाल्यै पुरुषपशुमालभतापत्यकामः॥ १२॥
किसी समय डाकुओंके सरदारने, जिसके सामन्त शूद्र जातिके थे, पुत्रकी कामनासे भद्रकालीको मनुष्यकी बलि देनेका संकल्प किया॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.9.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 613) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/9/12/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—भद्रकाल्यै पशुमालभता।
(मुद्रित पृष्ठ 613)