अथ त एनमनवद्यलक्षणमवमृश्य भर्तृकर्मनिष्पत्तिं मन्यमाना बद्ध्वारशनया चण्डिकागृहमुपनिन्युर्मुदा विकसितवदनाः॥ १४॥
atha ta enamanavadyalakṣaṇamavamṛśya bhartṛkarmaniṣpattiṃ manyamānā baddhvāraśanayā caṇḍikāgṛhamupaninyurmudā vikasitavadanāḥ|| 14||
अर्थ
उन्होंने देखा कि यह पशु तो बड़े अच्छे लक्षणोंवाला है, इससे हमारे स्वामीका कार्य अवश्य सिद्ध हो जायगा। यह सोचकर उनका मुख आनन्दसे खिल उठा और वे उन्हें रस्सियोंसे बाँधकर चण्डिकाके मन्दिरमें ले आये॥ १४॥
अथ त एनमनवद्यलक्षणमवमृश्य भर्तृकर्मनिष्पत्तिं मन्यमाना बद्ध्वारशनया चण्डिकागृहमुपनिन्युर्मुदा विकसितवदनाः॥ १४॥
उन्होंने देखा कि यह पशु तो बड़े अच्छे लक्षणोंवाला है, इससे हमारे स्वामीका कार्य अवश्य सिद्ध हो जायगा। यह सोचकर उनका मुख आनन्दसे खिल उठा और वे उन्हें रस्सियोंसे बाँधकर चण्डिकाके मन्दिरमें ले आये॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.9.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 614) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/9/14/