श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.11

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

कर्मणा कर्मनिर्हारो२ न ह्यात्यन्तिक इष्यते।

अविद्वदधिकारित्वात्प्रायश्चित्तं३ विमर्शनम्॥ ११

karmaṇā karmanirhāro na hyātyantika iṣyate|

avidvadadhikāritvātprāyaścittaṃ vimarśanam|| 11

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—वस्तुतः कर्मके द्वारा ही कर्मका निर्बीज नाश नहीं होता; क्योंकि कर्मका अधिकारी अज्ञानी है। अज्ञान रहते पापवासनाएँ सर्वथा नहीं मिट सकतीं। इसलिये सच्चा प्रायश्चित्त तो तत्त्वज्ञान ही है॥ ११॥✎ 492

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कर्मनिर्वेगो न चात्यन्तिक।

    (मुद्रित पृष्ठ 696)
  2. ३

    प्रा० पा०—कारत्वा०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 696)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #492 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रायश्चित्ततो → प्रायश्चित्त तो

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