परीक्षित्! पापी पुरुषकी जैसी शुद्धि भगवान्को आत्मसमर्पण करनेसे और उनके भक्तोंका सेवन करनेसे होती है, वैसी तपस्या आदिके द्वारा नहीं होती॥ १६॥✎ 494
न तथा ह्यघवान् राजन् पूयेत तप आदिभिः।
यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुषनिषेवया॥ १६
परीक्षित्! पापी पुरुषकी जैसी शुद्धि भगवान्को आत्मसमर्पण करनेसे और उनके भक्तोंका सेवन करनेसे होती है, वैसी तपस्या आदिके द्वारा नहीं होती॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 697) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/1/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)