॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.4
प्रियव्रतोत्तानपदोर्वंशस्तच्चरितानि च।
द्वीपवर्षसमुद्राद्रिनद्युद्यानवनस्पतीन् ॥ ४
priyavratottānapadorvaṃśastaccaritāni ca|
dvīpavarṣasamudrādrinadyudyānavanaspatīn || 4
अर्थ
साथ ही (चौथे और पाँचवें स्कन्धमें) प्रियव्रत और उत्तानपादके वंशों तथा चरित्रोंका एवं द्वीप, वर्ष, समुद्र, पर्वत, नदी, उद्यान और विभिन्न द्वीपोंके वृक्षोंका भी निरूपण किया॥ ४॥