श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.55

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एष प्रकृतिसङ्गेन पुरुषस्य विपर्ययः।

आसीत् स एव नचिरादीशसङ्गाद्विलीयते॥ ५५

eṣa prakṛtisaṅgena puruṣasya viparyayaḥ|

āsīt sa eva nacirādīśasaṅgādvilīyate|| 55

अर्थ

प्रकृतिका संसर्ग होनेसे ही पुरुष अपनेको अपने वास्तविक स्वरूपके विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है। यह विपर्यय भगवान्‌के भजनसे शीघ्र ही दूर हो जाता है॥ ५५॥

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