श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.57

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

गुर्वग्न्यतिथिवृद्धानां शुश्रूषुर्निरहङ्कृतः।

सर्वभूतसुहृत्साधुर्मितवागनसूयकः ॥ ५७

gurvagnyatithivṛddhānāṃ śuśrūṣurnirahaṅkṛtaḥ|

sarvabhūtasuhṛtsādhurmitavāganasūyakaḥ || 57

अर्थ

इसने गुरु, अग्‍नि, अतिथि और वृद्ध पुरुषोंकी सेवा की थी। अहंकार तो इसमें था ही नहीं। यह समस्त प्राणियोंका हित चाहता, उपकार करता, आवश्यकताके अनुसार ही बोलता और किसीके गुणोंमें दोष नहीं ढूँढ़ता था॥ ५७॥✎ 1360 1361

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1360 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्मचारी, → ब्रतधारी,
  • #1361 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रतधारी, → व्रतधारी,

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