श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.59

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

ददर्श कामिनं कञ्चिच्छूद्रं सह भुजिष्यया।✎ 1069

पीत्वा च मधु मैरेयं मदाघूर्णितनेत्रया॥ ५९

dadarśa kāminaṃ kañcicchūdraṃ saha bhujiṣyayā|

pītvā ca madhu maireyaṃ madāghūrṇitanetrayā|| 59

अर्थ

लौटते समय इसने देखा कि एक भ्रष्ट शूद्र, जो बहुत कामी और निर्लज्ज है, शराब पीकर किसी वेश्याके साथ विहार कर रहा है। वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। नशेके कारण उसकी आँखें नाच रही हैं, वह अर्द्धनग्न अवस्थामें हो रही है। वह शूद्र उस वेश्याके साथ कभी गाता, कभी हँसता और कभी तरह-तरहकी चेष्टाएँ करके उसे प्रसन्‍न करता है॥ ५९-६०॥

यह अर्थ श्लोक 59–60 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1069 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कंञ्च‌िच्छूद्रं → कञ्चिच्छूद्रं

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