उस वेश्याको निमित्त बनाकर काम-पिशाचने अजामिलके मनको ग्रस लिया। इसकी सदाचार और शास्त्रसम्बन्धी चेतना नष्ट हो गयी। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्याका चिन्तन करने लगा और अपने धर्मसे विमुख हो गया॥ ६३॥
तन्निमित्तस्मरव्याजग्रहग्रस्तो विचेतनः।
तामेव मनसा ध्यायन् स्वधर्माद्विरराम ह॥ ६३
उस वेश्याको निमित्त बनाकर काम-पिशाचने अजामिलके मनको ग्रस लिया। इसकी सदाचार और शास्त्रसम्बन्धी चेतना नष्ट हो गयी। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्याका चिन्तन करने लगा और अपने धर्मसे विमुख हो गया॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 702) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/63/