उस स्वच्छन्दचारिणी कुलटाकी तिरछी चितवनने इसके मनको ऐसा लुभा लिया कि इसने अपनी कुलीन नवयुवती और विवाहिता पत्नीतकका परित्याग कर दिया। इसके पापकी भी भला कोई सीमा है॥ ६५॥
विप्रां स्वभार्यामप्रौढां कुले महति लम्भिताम्।
विससर्जाचिरात्पापः स्वैरिण्यापाङ्गविद्धधीः॥ ६५
उस स्वच्छन्दचारिणी कुलटाकी तिरछी चितवनने इसके मनको ऐसा लुभा लिया कि इसने अपनी कुलीन नवयुवती और विवाहिता पत्नीतकका परित्याग कर दिया। इसके पापकी भी भला कोई सीमा है॥ ६५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.65 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 702) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/1/65/