श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.10.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

वृत्रमभ्यद्रवच्छेत्तुमसुरानीकयूथपैः ।

पर्यस्तमोजसा राजन् क्रुद्धो रुद्र इवान्तकम्॥ १५

vṛtramabhyadravacchettumasurānīkayūthapaiḥ |

paryastamojasā rājan kruddho rudra ivāntakam|| 15

अर्थ

भगवान्‌की शक्ति पाकर इन्द्रका बल-पौरुष उन्‍नतिकी सीमापर पहुँच गया। अब विश्‍वकर्माजीने दधीचि ऋषिकी हड्डियोंसे वज्र बनाकर उन्हें दिया और वे उसे हाथमें लेकर ऐरावत हाथीपर सवार हुए। उनके साथ-साथ सभी देवतालोग तैयार हो गये। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि देवराज इन्द्रकी स्तुति करने लगे। अब उन्होंने त्रिलोकीको हर्षित करते हुए वृत्रासुरका वध करनेके लिये उसपर पूरी शक्ति लगाकर धावा बोल दिया—ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् रुद्र क्रोधित होकर स्वयं कालपर ही आक्रमण कर रहे हों। परीक्षित्! वृत्रासुर भी दैत्य-सेनापतियोंकी बहुत बड़ी सेनाके साथ मोर्चेपर डटा हुआ था॥ १३—१५॥✎ 526

यह अर्थ श्लोक 13–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #526 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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