॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.10.17
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां पितृवह्निभिः।
मरुद्भिर्ऋभुभिः साध्यैर्विश्वेदेवैर्मरुत्पतिम्॥ १७ ✎ 1090 1091
rudrairvasubhirādityairaśvibhyāṃ pitṛvahnibhiḥ|
marudbhir:ṛbhubhiḥ sādhyairviśvedevairmarutpatim|| 17
अर्थ
उस समय देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदिके साथ अपनी कान्तिसे शोभायमान हो रहे थे। वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये॥ १७-१८॥