॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.10.32
जातस्य मृत्युर्ध्रुव एष सर्वतः
प्रतिक्रिया यस्य न चेह क्लृप्ता।
लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं
को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम्॥ ३२
jātasya mṛtyurdhruva eṣa sarvataḥ
pratikriyā yasya na ceha klṛptā|
loko yaśaścātha tato yadi hyamuṃ
ko nāma mṛtyuṃ na vṛṇīta yuktam|| 32
अर्थ
इसमें सन्देह नहीं कि जो पैदा हुआ है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना पड़ेगा। इस जगत्में विधाताने मृत्युसे बचनेका कोई उपाय नहीं बताया है। ऐसी स्थितिमें यदि मृत्युके द्वारा स्वर्गादि लोक और सुयश भी मिल रहा हो तो ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उस उत्तम मृत्युको न अपनायेगा॥ ३२॥