दधीचि ऋषिने कहा—देवताओ! मैंने आपलोगोंके मुँहसे धर्मकी बात सुननेके लिये ही आपकी माँगके प्रति उपेक्षा दिखलायी थी। यह लीजिये, मैं अपने प्यारे शरीरको आप लोगोंके लिये अभी छोड़े देता हूँ। क्योंकि एक दिन यह स्वयं ही मुझे छोड़नेवाला है॥ ७॥
धर्मं वः श्रोतुकामेन यूयं मे प्रत्युदाहृताः।
एष वः प्रियमात्मानं त्यजन्तं संत्यजाम्यहम्॥ ७
दधीचि ऋषिने कहा—देवताओ! मैंने आपलोगोंके मुँहसे धर्मकी बात सुननेके लिये ही आपकी माँगके प्रति उपेक्षा दिखलायी थी। यह लीजिये, मैं अपने प्यारे शरीरको आप लोगोंके लिये अभी छोड़े देता हूँ। क्योंकि एक दिन यह स्वयं ही मुझे छोड़नेवाला है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.10.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 754) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/10/7/