॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.12.15
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।
तत्र साक्षिणमात्मानं यो वेद न स बध्यते॥ १५
sattvaṃ rajastama iti prakṛternātmano guṇāḥ|
tatra sākṣiṇamātmānaṃ yo veda na sa badhyate|| 15
अर्थ
सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिके हैं, आत्माके नहीं; अतः जो पुरुष आत्माको उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोषसे लिप्त नहीं होता॥ १५॥