श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।

तत्र साक्षिणमात्मानं यो वेद न स बध्यते॥ १५

sattvaṃ rajastama iti prakṛternātmano guṇāḥ|

tatra sākṣiṇamātmānaṃ yo veda na sa badhyate|| 15

अर्थ

सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिके हैं, आत्माके नहीं; अतः जो पुरुष आत्माको उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोषसे लिप्त नहीं होता॥ १५॥

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