श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इन्द्रो वृत्रवचः श्रुत्वा गतालीकमपूजयत्।

गृहीतवज्रः प्रहसंस्तमाह गतविस्मयः॥ १८

indro vṛtravacaḥ śrutvā gatālīkamapūjayat|

gṛhītavajraḥ prahasaṃstamāha gatavismayaḥ|| 18

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वृत्रासुरके ये सत्य एवं निष्कपट वचन सुनकर इन्द्रने उनका आदर किया और अपना वज्र उठा लिया। इसके बाद बिना किसी प्रकारका आश्‍चर्य किये मुसकराते हुए वे कहने लगे—॥ १८॥

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