॥ श्रीहरिः ॥
आविध्य परिघं वृत्रः कार्ष्णायसमरिन्दमः।
इन्द्राय प्राहिणोद् घोरं वामहस्तेन मारिष॥ २४
āvidhya parighaṃ vṛtraḥ kārṣṇāyasamarindamaḥ|
indrāya prāhiṇod ghoraṃ vāmahastena māriṣa|| 24
अर्थ
राजन्! अब शत्रुसूदन वृत्रासुरने बायें हाथसे फौलादका बना हुआ एक बहुत भयावना परिघ उठाकर आकाशमें घुमाया और उससे इन्द्रपर प्रहार किया॥ २४॥
आविध्य परिघं वृत्रः कार्ष्णायसमरिन्दमः।
इन्द्राय प्राहिणोद् घोरं वामहस्तेन मारिष॥ २४
राजन्! अब शत्रुसूदन वृत्रासुरने बायें हाथसे फौलादका बना हुआ एक बहुत भयावना परिघ उठाकर आकाशमें घुमाया और उससे इन्द्रपर प्रहार किया॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 763) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/12/24/