जड़से दोनों भुजाओंके कट जानेपर वृत्रासुरके बायें और दायें दोनों कंधोंसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय वह ऐसा जान पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रकी चोटसे पंख कट जानेपर कोई पर्वत ही आकाशसे गिरा हो॥ २६॥
दोर्भ्यामुत्कृत्तमूलाभ्यां बभौ रक्तस्रवोऽसुरः।
छिन्नपक्षो यथा गोत्रः खाद् भ्रष्टो वज्रिणा हतः॥ २६
जड़से दोनों भुजाओंके कट जानेपर वृत्रासुरके बायें और दायें दोनों कंधोंसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय वह ऐसा जान पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रकी चोटसे पंख कट जानेपर कोई पर्वत ही आकाशसे गिरा हो॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 763) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/12/26/