श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

दोर्भ्यामुत्कृत्तमूलाभ्यां बभौ रक्तस्रवोऽसुरः।

छिन्‍नपक्षो यथा गोत्रः खाद् भ्रष्टो वज्रिणा हतः॥ २६

dorbhyāmutkṛttamūlābhyāṃ babhau raktasravo'suraḥ|

chinnapakṣo yathā gotraḥ khād bhraṣṭo vajriṇā hataḥ|| 26

अर्थ

जड़से दोनों भुजाओंके कट जानेपर वृत्रासुरके बायें और दायें दोनों कंधोंसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय वह ऐसा जान पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रकी चोटसे पंख कट जानेपर कोई पर्वत ही आकाशसे गिरा हो॥ २६॥

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