श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

भित्त्वा वज्रेण तत्कुक्षिं निष्क्रम्य बलभिद् विभुः।

उच्चकर्त शिरः शत्रोर्गिरिशृंगमिवौजसा॥ ३२

bhittvā vajreṇa tatkukṣiṃ niṣkramya balabhid vibhuḥ|

uccakarta śiraḥ śatrorgiriśṛṃgamivaujasā|| 32

अर्थ

उन्होंने अपने वज्रसे उसकी कोख फाड़ डाली और उसके पेटसे निकलकर बड़े वेगसे उसका पर्वत-शिखरके समान ऊँचा सिर काट डाला॥ ३२॥✎ 1950

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1950 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उँचा → ऊँचा

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