श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.4

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

छिन्‍नैकबाहुः परिघेण वृत्रः

संरब्ध आसाद्य गृहीतवज्रम्।

हनौ तताडेन्द्रमथामरेभं

वज्रं च हस्तान्‍न्यपतन्मघोनः॥ ४

chinnaikabāhuḥ parigheṇa vṛtraḥ

saṃrabdha āsādya gṛhītavajram|

hanau tatāḍendramathāmarebhaṃ

vajraṃ ca hastānnyapatanmaghonaḥ|| 4

अर्थ

एक बाँह कट जानेपर वृत्रासुरको बहुत क्रोध हुआ। उसने वज्रधारी इन्द्रके पास जाकर उनकी ठोड़ीमें और गजराज ऐरावतपर परिघसे ऐसा प्रहार किया कि उनके हाथसे वह वज्र गिर पड़ा॥ ४॥

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