॥ श्रीहरिः ॥
तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत।
यथावद्दीक्षयाञ्चक्रुः पुरुषाराधनेन ह॥ १८
taṃ ca brahmarṣayo'bhyetya hayamedhena bhārata|
yathāvaddīkṣayāñcakruḥ puruṣārādhanena ha|| 18
अर्थ
परीक्षित्! इन्द्रके स्वर्गमें आ जानेपर ब्रह्मर्षियोंने वहाँ आकर भगवान्की आराधनाके लिये इन्द्रको अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा दी, उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया॥ १८॥✎ 534 535 536 537
तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत।
यथावद्दीक्षयाञ्चक्रुः पुरुषाराधनेन ह॥ १८
परीक्षित्! इन्द्रके स्वर्गमें आ जानेपर ब्रह्मर्षियोंने वहाँ आकर भगवान्की आराधनाके लिये इन्द्रको अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा दी, उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.13.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 767) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/13/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
- #534 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #535 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #536 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #537 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की