श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

इन्द्र उवाच

स्त्रीभूजलद्रुमैरेनो विश्‍वरूपवधोद्भवम्।

विभक्तमनुगृह्णद्भिर्वृत्रहत्यां क्‍व मार्ज्म्यहम्॥ ५

strībhūjaladrumaireno viśvarūpavadhodbhavam|

vibhaktamanugṛhṇadbhirvṛtrahatyāṃ kva mārjmyaham|| 5

अर्थ

देवराज इन्द्रने उन लोगोंसे कहा—देवताओ और ऋषियो! मुझे विश्‍वरूपके वधसे जो ब्रह्महत्या लगी थी, उसे तो स्त्री, पृथ्वी, जल और वृक्षोंने कृपा करके बाँट लिया। अब यदि मैं वृत्रका वध करूँ तो उसकी हत्यासे मेरा छुटकारा कैसे होगा?॥ ५॥

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