नरेन्द्र! जिस प्रकार राजा अपनी उपर्युक्त प्रकृतियोंके अनुकूल रहनेपर ही राज्यसुख भोग सकता है, वैसे ही प्रकृतियाँ भी अपनी रक्षाका भार राजापर छोड़कर सुख और समृद्धि लाभ कर सकती हैं॥ १८॥
आत्मानं प्रकृतिष्वद्धा निधाय श्रेय आप्नुयात्।
राज्ञा तथा प्रकृतयो नरदेवाहिताधयः॥ १८
नरेन्द्र! जिस प्रकार राजा अपनी उपर्युक्त प्रकृतियोंके अनुकूल रहनेपर ही राज्यसुख भोग सकता है, वैसे ही प्रकृतियाँ भी अपनी रक्षाका भार राजापर छोड़कर सुख और समृद्धि लाभ कर सकती हैं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 769) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/18/