परन्तु मैं देख रहा हूँ कि तुम स्वयं सन्तुष्ट नहीं हो। तुम्हारी कोई कामना अपूर्ण है। तुम्हारे मुँहपर किसी आन्तरिक चिन्ताके चिह्न झलक रहे हैं। तुम्हारे इस असन्तोषका कारण कोई और है या स्वयं तुम्हीं हो?॥ २१॥
आत्मनः प्रीयते नात्मा परतः स्वत एव वा।
लक्षयेऽलब्धकामं त्वां चिन्तया शबलं मुखम्॥ २१
परन्तु मैं देख रहा हूँ कि तुम स्वयं सन्तुष्ट नहीं हो। तुम्हारी कोई कामना अपूर्ण है। तुम्हारे मुँहपर किसी आन्तरिक चिन्ताके चिह्न झलक रहे हैं। तुम्हारे इस असन्तोषका कारण कोई और है या स्वयं तुम्हीं हो?॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 770) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/21/