श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.55

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः

शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः।

यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये

स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्‍चसि॥ ५५

na hi kramaścediha mṛtyujanmanoḥ

śarīriṇāmastu tadā''tmakarmabhiḥ|

yaḥ snehapāśo nijasargavṛddhaye

svayaṃ kṛtaste tamimaṃ vivṛścasi|| 55

अर्थ

यदि संसारमें प्राणियोंके जीवन-मरणका कोई क्रम न रहे, तो वे अपने प्रारब्धके अनुसार जन्मते-मरते रहेंगे। फिर तेरी आवश्यकता ही क्या है। तूने सम्बन्धियोंमें स्नेह-बन्धन तो इसीलिये डाल रखा है कि वे तेरी सृष्टिको बढ़ायें? परन्तु तू इस प्रकार बच्चोंको मारकर अपने किये-करायेपर अपने हाथों पानी फेर रहा है’॥ ५५॥

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