श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्देके समान अपने मृत पुत्रके पास ही पड़े हुए थे। अब महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारद उन्हें सुन्दर-सुन्दर उक्तियोंसे समझाने लगे॥ १॥
ऊचतुर्मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम्।
शोकाभिभूतं राजानं बोधयन्तौ सदुक्तिभिः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्देके समान अपने मृत पुत्रके पास ही पड़े हुए थे। अब महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारद उन्हें सुन्दर-सुन्दर उक्तियोंसे समझाने लगे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 775) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/15/1/