श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अङ्गिरा उवाच

अहं ते पुत्रकामस्य पुत्रदोऽस्म्यङ्गिरा नृप।

एष ब्रह्मसुतः साक्षान्‍नारदो भगवानृषिः॥ १७

ahaṃ te putrakāmasya putrado'smyaṅgirā nṛpa|

eṣa brahmasutaḥ sākṣānnārado bhagavānṛṣiḥ|| 17

अर्थ

महर्षि अंगिराने कहा—राजन्! जिस समय तुम पुत्रके लिये बहुत लालायित थे, तब मैंने ही तुम्हें पुत्र दिया था। मैं अंगिरा हूँ। ये जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, स्वयं ब्रह्माजीके पुत्र सर्वसमर्थ देवर्षि नारद हैं॥ १७॥

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