जीवात्माकी यह देह—जो पंचभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंका संघात है—जीवको विविध प्रकारके क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है॥ २५॥✎ 1985
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः।
देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः॥ २५
जीवात्माकी यह देह—जो पंचभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंका संघात है—जीवको विविध प्रकारके क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 777) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/15/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1985 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): जीवात्माका → जीवात्माकी