श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे ✎ 1092

शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य।

सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं

प्रापुर्भवानपि परं नचिरादुपैति॥ २८

yatpādamūlamupasṛtya narendra pūrve

śarvādayo bhramamimaṃ dvitayaṃ visṛjya|

sadyastadīyamatulānadhikaṃ mahitvaṃ

prāpurbhavānapi paraṃ nacirādupaiti|| 28

अर्थ

नरेन्द्र! प्राचीन कालमें भगवान् शंकर आदिने श्रीसंकर्षणदेवके ही चरणकमलोंका आश्रय लिया था। इससे उन्होंने द्वैतभ्रमका परित्याग कर दिया और उनकी उस महिमाको प्राप्त हुए जिससे बढ़कर तो कोई है ही नहीं, समान भी नहीं है। तुम भी बहुत शीघ्र ही भगवान्‌के उसी परमपदको प्राप्त कर लोगे॥ २८॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
चित्रकेतुसान्त्वनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः
॥ १५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1092 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पूर्व → पूर्वे

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