श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.10

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

न ह्यस्यातिप्रियः कश्चिन्‍नाप्रियः स्वः परोऽपि वा।

एकः सर्वधियां द्रष्टा कर्तॄणां गुणदोषयोः॥ १०✎ 1093

na hyasyātipriyaḥ kaścinnāpriyaḥ svaḥ paro'pi vā|

ekaḥ sarvadhiyāṃ draṣṭā kartṝṇāṃ guṇadoṣayoḥ|| 10

अर्थ

इसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है और न अप्रिय, न अपना और न पराया। क्योंकि गुण-दोष (हित-अहित) करनेवाले मित्र-शत्रु आदिकी भिन्‍न-भिन्‍न बुद्धि-वृत्तियोंका यह अकेला ही साक्षी है; वास्तवमें यह अद्वितीय है॥ १०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1093 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कर्तृणां → कर्तॄणां

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