॥ श्रीहरिः ॥
भक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारदः।
ययावङ्गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो॥ २६
bhaktāyaitāṃ prapannāya vidyāmādiśya nāradaḥ|
yayāvaṅgirasā sākaṃ dhāma svāyambhuvaṃ prabho|| 26
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवर्षि नारद अपने शरणागत भक्त चित्रकेतुको इस विद्याका उपदेश करके महर्षि अंगिराके साथ ब्रह्मलोकको चले गये॥ २६॥
भक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारदः।
ययावङ्गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो॥ २६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवर्षि नारद अपने शरणागत भक्त चित्रकेतुको इस विद्याका उपदेश करके महर्षि अंगिराके साथ ब्रह्मलोकको चले गये॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 781) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/26/