श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.31

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः

स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः१।

प्रवृद्धभक्‍त्या प्रणयाश्रुलोचनः

प्रहृष्टरोमानमदादिपूरुषम् ॥ ३१

taddarśanadhvastasamastakilbiṣaḥ

svacchāmalāntaḥkaraṇo'bhyayānmuniḥ|

pravṛddhabhaktyā praṇayāśrulocanaḥ

prahṛṣṭaromānamadādipūruṣam || 31

अर्थ

भगवान् शेषका दर्शन करते ही राजर्षि चित्रकेतुके सारे पाप नष्ट हो गये। उनका अन्तःकरण स्वच्छ और निर्मल हो गया। हृदयमें भक्तिभावकी बाढ़ आ गयी। नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये। शरीरका एक-एक रोम खिल उठा। उन्होंने ऐसी ही स्थितिमें आदिपुरुष भगवान् शेषको नमस्कार किया॥ ३१॥✎ 542

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मुहुः।

    (मुद्रित पृष्ठ 782)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #542 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् की → शेषभगवान्‌की

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