॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.34
चित्रकेतुरुवाच
अजित जितः सममतिभिः
साधुभिर्भवान् जितात्मभिर्भवता।
विजितास्तेऽपि च भजता-
मकामात्मनां य आत्मदोऽतिकरुणः॥ ३४
ajita jitaḥ samamatibhiḥ
sādhubhirbhavān jitātmabhirbhavatā|
vijitāste'pi ca bhajatā-
makāmātmanāṃ ya ātmado'tikaruṇaḥ|| 34
अर्थ
चित्रकेतुने कहा—अजित! जितेन्द्रिय एवं समदर्शी साधुओंने आपको जीत लिया है। आपने भी अपने सौन्दर्य, माधुर्य, कारुण्य आदि गुणोंसे उनको अपने वशमें कर लिया है। अहो, आप धन्य हैं! क्योंकि जो निष्कामभावसे आपका भजन करते हैं, उन्हें आप करुणापरवश होकर अपने-आपको भी दे डालते हैं॥ ३४॥