॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.37
क्षित्यादिभिरेष किलावृतः
सप्तभिर्दशगुणोत्तरैराण्डकोशः ।
यत्र पतत्यणुकल्पः
सहाण्डकोटिकोटिभिस्तदनन्तः॥ ३७
kṣityādibhireṣa kilāvṛtaḥ
saptabhirdaśaguṇottarairāṇḍakośaḥ |
yatra patatyaṇukalpaḥ
sahāṇḍakoṭikoṭibhistadanantaḥ|| 37
अर्थ
यह ब्रह्माण्डकोष, जो पृथ्वी आदि एक-से-एक दसगुने सात आवरणोंसे घिरा हुआ है, अपने ही समान दूसरे करोड़ों ब्रह्माण्डोंके सहित आपमें एक परमाणुके समान घूमता रहता है और फिर भी उसे आपकी सीमाका पता नहीं है। इसलिये आप अनन्त हैं॥ ३७॥