॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.4
जीव उवाच
कस्मिञ्जन्मन्यमी मह्यं पितरो मातरोऽभवन्।
कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्नृयोनिषु॥ ४
kasmiñjanmanyamī mahyaṃ pitaro mātaro'bhavan|
karmabhirbhrāmyamāṇasya devatiryaṅnṛyoniṣu|| 4
अर्थ
जीवात्माने कहा—देवर्षिजी! मैं अपने कर्मोंके अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियोंमें न जाने कितने जन्मोंसे भटक रहा हूँ। उनमेंसे ये लोग किस जन्ममें मेरे माता-पिता हुए?॥ ४॥