श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशामें भगवान् संकर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्गसे स्वच्छन्द विचरने लगे॥ १॥
यतश्चान्तर्हितोऽनन्तस्तस्यै कृत्वा दिशे नमः।
विद्याधरश्चित्रकेतुश्चचार गगनेचरः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशामें भगवान् संकर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्गसे स्वच्छन्द विचरने लगे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 787) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/1/