॥ श्रीहरिः ॥
अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः।
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत्॥ ११
ayaṃ kimadhunā loke śāstā daṇḍadharaḥ prabhuḥ|
asmadvidhānāṃ duṣṭānāṃ nirlajjānāṃ ca viprakṛt|| 11
अर्थ
पार्वतीजी बोलीं—अहो! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या?॥ ११॥
अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः।
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत्॥ ११
पार्वतीजी बोलीं—अहो! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या?॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 788) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/11/