श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

संसारचक्र एतस्मिञ्जन्तुरज्ञानमोहितः।

भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा॥ १८

saṃsāracakra etasmiñjanturajñānamohitaḥ|

bhrāmyan sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca bhuṅkte sarvatra sarvadā|| 18

अर्थ

देवि! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसारचक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दुःख भोगता रहता है॥ १८॥

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