॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.18.25
कृमिविड्भस्मसंज्ञाऽऽसीद्यस्येशाभिहितस्य च।
भूतध्रुक् तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः॥ २५
kṛmiviḍbhasmasaṃjñā''sīdyasyeśābhihitasya ca|
bhūtadhruk tatkṛte svārthaṃ kiṃ veda nirayo yataḥ|| 25
अर्थ
लोग राजाओंके, देवताओंके शरीरको ‘प्रभु’ कहकर पुकारते हैं; परन्तु एक दिन वह कीड़ा, विष्ठा या राखका ढेर हो जाता है, इसके लिये जो दूसरे प्राणियोंको सताता है, उसे अपने सच्चे स्वार्थ या परमार्थका पता नहीं है; क्योंकि इससे तो नरकमें जाना पड़ेगा॥ २५॥