कश्यपजीने कहा—अनिन्द्यसुन्दरी प्रिये! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो। पतिके प्रसन्न हो जानेपर पत्नीके लिये लोक या परलोकमें कौन-सी अभीष्ट वस्तु दुर्लभ है॥ ३२॥ शास्त्रोंमें यह बात स्पष्ट कही गयी है कि पति ही स्त्रियोंका परमाराध्य इष्टदेव है। प्रिये! लक्ष्मीपति भगवान् वासुदेव ही समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं॥ ३३॥
यह व्याख्या श्लोक 6.18.32 से 6.18.33 तककी एक साथ है।
वरं वरय वामोरु प्रीतस्तेऽहमनिन्दिते।
स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते कः काम इह चागमः॥ ३२
कश्यपजीने कहा—अनिन्द्यसुन्दरी प्रिये! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो। पतिके प्रसन्न हो जानेपर पत्नीके लिये लोक या परलोकमें कौन-सी अभीष्ट वस्तु दुर्लभ है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 795) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/32/