श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.34

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स एव देवतालिङ्गैर्नामरूपविकल्पितैः।

इज्यते भगवान् पुम्भिः स्त्रीभिश्‍च पतिरूपधृक्॥ ३४

sa eva devatāliṅgairnāmarūpavikalpitaiḥ|

ijyate bhagavān pumbhiḥ strībhiśca patirūpadhṛk|| 34

अर्थ

विभिन्‍न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है। सभी पुरुष—चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें—उन्हींकी उपासना करते हैं। ठीक वैसे ही स्त्रियोंके लिये भगवान्‌ने पतिका रूप धारण किया है। वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं॥ ३४॥✎ 551

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #551 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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