कल्याणी! तुमने बड़े प्रेमभावसे, भक्तिसे मेरी वैसी ही पूजा की है। अब मैं तुम्हारी सब अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा। असतियोंके जीवनमें ऐसा होना अत्यन्त दुर्लभ है॥ ३६॥✎ 551
सोऽहं त्वयार्चितो भद्रे ईदृग्भावेन भक्तितः।
तत्ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम्॥ ३६
कल्याणी! तुमने बड़े प्रेमभावसे, भक्तिसे मेरी वैसी ही पूजा की है। अब मैं तुम्हारी सब अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा। असतियोंके जीवनमें ऐसा होना अत्यन्त दुर्लभ है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 795) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)